Saturday, October 31, 2026

MAHARAJA SUNDAR SINGH AKA MAHARAJA SUNDAR SHAH - 4th RAJA of TEKARI - 1711 AD - 1757 AD - THE BRAVEST WARRIOR of 18th CENTRURY AWADH, MAGADH and BENGAL

 महाराजा सुंदर शाह


टिकारी राज का चतुर्थ राजा

सुंदर सिंह @ सुंदर शाह, टिकारी राज के प्रथम राजा वीर सिंह उर्फ़ धीर सिंह के द्वितीय पुत्र थे.

इनका जन्म १७११ इस्वी में टिकारी के लाव गढ़ में हुआ था. यह बचपन से ही देखने में बेहद सुंदर, अच्छी कद काठी, ताकतवर, तेज तर्रार बुधि के असाधारण बालक थे. इनकी माँ, अजीमाबाद (पटना) के नायब सूबेदार राजा कंचन सिंह के बेटी थी.

सुंदर सिंह के बचपन का अधिकाँश समय अपने ननिहाल पाली राज (पटना) में बिता था. राजा कंचन सिंह अपने नाती सुंदर सिंह को बहुत प्यार करते थे और इनको अच्छी पढाई के साथ-साथ हर तरह शस्त्र और युद्ध कला का प्रशिक्षण भी दिलवाया था. राजा कंचन सिंह जब कभी भी बंगाल के नवाब और दिल्ली के मुग़ल बादशाह के दरबार में जाते तो हमेशा साथ में इनको भी रखा करते थे. नाना के साथ रह कर राज के कार्य में भी दक्षता प्राप्त कर लिए थे. पटना में अपनी आगे की पढाई पूरी कर ही रहे थे की सन १७२९ में उनके पिताजी राजा वीर सिंह की मृत्यु हो गयी. वह अपना पढाई बीच में छोड़कर टिकारी वापस लौट आये. उस समय इनकी उम्र मात्र १८ वर्ष की थी.

राजा वीर सिंह को मृत्यु के बाद उनके बड़े लड़के त्रिभुवन सिंह टिकारी राज के गद्दी पर बैठे. राजा वीर सिंह के मंझले लड़के सुंदर सिंह @ सुंदर शाह थे. उस समय के उतराधिकार कानून के तहत वह राजा नहीं बन सकते थे. राजा त्रिभुवन सिंह के प्रधान मंत्री एवं सेनापति का दोनों कार्य सुंदर सिंह संभाले हुए थे. वे राज के कार्य में बराबर सहयोग करते रहते थे.

सन १७३६ इसवी में बड़े भाई राजा त्रिभुवन सिंह की मृत्यु हो गयी थी, उस समय उनके सबसे बड़े पुत्र फ़तेह सिंह नवालिग़ मात्र ७ वर्ष का था. राज के उतराधिकार कानून के तहत फ़तेह सिंह टिकारी राज के राजा बनाये गए.

सुंदर शाह अपने नवालिग़ भतीजे के अधिकार पत्र के द्वारा टिकारी राज की सारी जिम्मेवारी संभाल ली थी. वे राजा फ़तेह सिंह के प्रतिनिधि के रूप में टिकारी राज के सारे कार्य को देखने-करने लगे थे.

पिता के द्वारा किय गरे करार के अनुसार, फ़तेह सिंह मुर्शिदाबाद के सूबेदार को सैन्य सहायता जारी रखे हुए थे. वे अपने चाचा सुंदर सिंह के ऊपर टिकारी राज के सारी जिम्मेवारी छोड़ कर बंगाल चले गए. वे बंगाल के नवाब के राज दरबार में मुर्शिदाबाद के रक्षा के लिय उनके सेना के कमांडर के रूप सन १७४६ से १७५९ तक अपनी सेवा का योगदान दी.

अजीमाबाद के सूबेदार और इलाहबाद के सूबेदार यानी किंग मेकर सैयद बंधू के हत्या हो जाने के बाद उनके नाना नायक सूबेदार राजा कंचन सिंह का बंगाल के नवाब पर पकड़ कम हो गया था. राजा सुंदर सिंह युवा अवस्था से ही मुग़ल बादशाह के सैनिक टुकड़ियों से बराबर युद्ध करते रहते थे, उन टुकड़ियों को पराजित किया करते थे.

सन १७३५ इसवी में राजा सुंदर सिंह का प्रथम युद्ध उतरेन के नवाब हिम्मत खान एवं उसके सेनापति शेर खान के साथ पाली से दो किलोमीटर दक्षिण मोरहर नदी के पूर्वी किनारे स्थित चांदी के मैदान में दोनो के बीच जबरदस्त युद्ध हुई, अंत में नवाब मारा गया और उसका सेनापति मैदान छोड़ कर भाग खड़ा हुआ, कुछ दिन बाद वह भी मारा गया. सुंदर सिंह का पाली के नवाब के गढ़ पर कब्ज़ा हो गया. नवाब के मारे जाने की खबर मगध में आग के तरह फ़ैल गयी और सुंदर सिंह की वीरता की चर्चा होने लगी.

बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला ने सेनापति फैज़ुल्लाह खान के नेतृत्व में एक सैन्य टुकड़ी सुंदर सिंह को पकड़ने के लिय टिकारी भेजा. वह टिकारी आने के क्रम में किंजर के जागीरदार आनंद सिंह, अरवल में कयाल गढ़ के जागीरदार भारत सिंह के सेनाओं को अपने साथ में ले लिया. दोनों पाली, पटना के राजा कंचन सिंह के रिश्तेदार भी थे. मुहम्मद शाह ने कंचन सिंह को फैज़ुल्लाह खान को मदद करने के लिए कहा था. परन्तु वे चतुराई से अपने को बुजुर्ग होने के बहाना बना कर उस युद्ध से दूरी बना लिए थे. वे अपने मित्र किंजर आनंद सिंह को किसी भी तरह दोनों के बीच सुलह करवाने के लिय बोला था. आनंद सिंह ने युद्ध के पहले दोनों के बीच सुलह करवाने के लिय काफी कोशिश की पर सुलह नहीं हो सका. अंत में फैज़ुल्लाह खान और सुंदर सिंह के सेनाओं के बीच लोदीपुर के उत्तर स्थित मैदान में भयंकर युद्ध हुआ, युद्ध के अंत में फैज़ुल्लाह खान मारा गया.

राजा सुंदर सिंह के टिकारी राज का सैन्य शक्ति दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था. लगातार युद्ध लड़ने के कारण उनका नाम जंग बहादुर सिंह पड़ गया. उनकी सेना में ४,००० घोडा, १०० हाथी, १०००० पैदल सैनिक थे. अब गया जिला के मध्य में टिकारी राज सबसे शक्तिशाली राज के रूप में उभर चूका था.

सन १७३९ में नादिरशाही हमले के कारण बिहार की राजनितिक स्थिति अस्त-व्यस्त हो गयी थी. इस अस्थिरता का लाभ उठाकर सुंदर सिंह ने अपने बाहुबल से अपने आस-पड़ोस के बारह परगना को अपने राज में मिला लिया. मराठा आक्रमण में सुंदर सिंह ने मुगलों का साथ दिया. इसलिय मुग़ल सम्राट शाह आलम दितीय ने उसे महाराजा के पदवी से नवाज़ा. सुंदर सिंह मगध के सबसे बड़े राजा बन चुके थे.

बंगाल के नवाब मुर्शिद कुली खान के दामाद नवाब सुजाऊदौला की मृत्यु के बाद सन १७३९ इसवी में सरफ़राज़ खान बंगाल के नवाब बन गए. वह उपर से बहुत दीनदयाल बनता था पर अन्दर अन्दर वह बहुत लालची था. उस समय बिहार में सुंदर सिंह ने उसके खिलाफ विद्रोह कर दिया था. उस विद्रोह को दबाने के लिय अजीमाबाद के सूबेदार अलीवर्दी खान ने बिहार में टिकारी राज की ओर कूच कर गया.

महाराजा सुंदर सिंह की तीसरी लड़ाई पटना के सूबेदार अलीवर्दी खान के साथ हुआ था, इस युद्ध में अलीवर्दी अपनी सेना का संचालन स्वयं कर रहे थे. उनके सेनापति मुस्ताफा खान अजीमाबाद के सूबेदार स्वयं बनना चाहता था. इसीलिय वह भी शीघ्र युद्ध जितना चाहता था. इस युद्ध में अलीवर्दी खान के विशाल सेना के सामने सुंदर सिंह की सेना कमजोर पड़ गई थी. सूबेदार अलीवर्दी खान के तरफ से सुंदर सिंह को दोस्ती का पैगाम आया. उसमें शर्त यह था की सुंदर सिंह को चार लाख रुपये बंगाल के नवाब को और पचास हज़ार रुपये अलीवर्दी खान को देना पड़ेगा. सुंदर सिंह ने शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया था.

इसी बीच सिरिस कुटुम्बा के जागीरदार क्योर सिंह, चिरकोवा के जागीरदार परबल सिंह, नरहट के जागीरदार कामगार खान और रामगढ के राजा ने अपनी अपनी सेनाओं के साथ टिकारी राज में आ कर सुंदर सिंह का मनोबल को काफी बढ़ा दिए. इससे सूबेदार अलीवर्दी खान का शर्त अमान्य हो गया. अब सुंदर सिंह के सैन्य शक्ति काफी शक्तिशाली हो जाने के बाद युद्ध जोश खरोश के साथ लड़े जाने लगा. दो सेनाओं के बीच महावत में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें अलीवर्दी खान हार गया. सेनापति मुस्तफा खान युद्ध छोड़ कर भाग खड़ा हुआ. युद्ध के समाप्ति के पश्चात सुंदर सिंह को अलीवर्दी खान का काफी धन एवं युद्ध सामग्री प्राप्त हुआ. वे सभी सामान को अपने टिकारी राज लेते आये.

अलीवर्दी खान पर विजय इतना आसान नहीं था, यह जीत सुंदर सिंह के युद्ध कौशल, हिम्मत और सूझबूझ का नतीजा था. इस जीत का सबसे बड़ा कारण था सुंदर सिंह का वह ललकार था जिसमें उन्होंने अपनी सेना को कहा था जिन सैनिकों को धन, पुत्र, स्त्री प्यारा है, वे अपने अपने घर वापस लौट जाये और जिन सैनिकों को मातृभूमि और अपना टिकारी राज का ध्वज का आदर, मान सम्मान पर विश्वास है वह मेरे साथ युद्ध के मैदान में चले. इस ललकार से वहां उपस्थित सैनिकों में जबरदस्त जोश का संचार हुआ और एक भी सैनिक युद्ध के मैदान को छोड़कर अपना घर वापस नहीं लौटा. सुंदर सिंह की इसी ललकार की वजह से अलीवर्दी खान पर विजय हुई.

राजा सुंदर सिंह के भतीजा और राजा त्रिभुवन सिंह के तीसरा पुत्र कुंवर बेचू सिंह था. वह एक बहुत बड़े लड़ाका थे. उनके बारे में लोग कहते है की वह सुंदर सिंह का दाहिना हाथ भी थे. सुंदर सिंह जहाँ कहीं भी युद्ध पर जाते थे या मुर्शिदाबाद में बंगाल के नवाब के दरबार में, दिल्ली के मुग़ल दरबार में जाते, हर समय अपने साथ बेचू सिंह को अवश्य रख लेते थे. बेचू सिंह कद काठी के बहुत मज़बूत, युद्ध कला के जानकार और हिम्मती थे. उन्हें युद्ध कला के जानकारी स्वयं सुंदर सिंह ने अपने साथ रख कर दिया था. वह सुंदर सिंह के सेना का सह कमांडर भी थे. वह सुंदर सिंह के साथ साया के तरह हमेशा कड़े रहते थे. सूबेदार अलीवर्दी खान के साथ महावत जंग में सुंदर सिंह के विजय में कुंवर बेचू सिंह का काफी बड़ा योगदान था. सन १७५१ में किसी के साथ भीषण जंग हुआ था, जंग के अंत में बेचू सिंह मारे गए थे. उस समय बेचू सिंह केवल अठारह वर्ष के युवा राजकुंवर थे. कुंवर बेचू सिंह के मारे जाने पर राजा सुंदर सिंह को बहुत बड़ा क्षति हुआ.

कुछ दिनों के बाद किसी षड्यंत्र में सुंदर सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें कैदी बना कर पटना लाया गया. सुंदर सिंह ने मुग़ल बादशाह के खिलाफ बगावत किया थे इसलिय उन्हें तोप से उड़ाने के लिय बंगाल के नवाब के यहाँ से आदेश आ गया था. अलीवर्दी खान युद्ध के समय से ही सुंदर सिंह में दूसरों से अलग अलग हट कर कुछ खास तरह के प्रतिभा को देख रहे थे. अलीवर्दी खान एक कुटनीतिज्ञ, समझदार एवं उदार प्रवृति का था. वह सुंदर सिंह को अपना दोस्त बनाना चाहते थे. अलीवर्दी खान ने उनके सामने एक प्रस्ताव रखा, उस प्रस्ताव के अनुसार सुंदर सिंह को बंगाल के सूबेदार शुजाउ-दिन-खान की पत्नी ज़न्नत-उन-निशा एवं उनकी पुत्री सूजी बेगम को नजराना में करीब एक लाख रूपया का गहना एवं काफी कीमती वस्त्र, साड़ी आदि भेंट करना था. प्रस्ताव पर सुंदर सिंह ने अपनी सहमती दे दी. नजराना भेंट करने के लिए काफी सुंदर व्यवस्था की गयी.

उनको नजराना के साथ मुर्शिदाबाद सूबेदार के यहाँ ले जाया गया. नजराना को देख कर दोनों महिलाए उसे सहर्ष स्वीकार कर ली. सुंदर सिंह के व्यवहार पर दोनों महिलाएं अति प्रसन्न हुई और उनको सजा से मुक्त करवा दी. सजा मुक्त करने के समय बंगाल सूबेदार ने नौ लाख रूपया जुर्माना के तौर पर सुंदर सिंह से माँगा. उक्त जुर्माना की राशी पर सुंदर सिंह की सहमती हो गयी. उनको स्वतंत्र कर दिया गया, वे सकुशल टिकारी राज वापस लौट आये. अब सुंदर सिंह बंगाल के नवाब और अलीवर्दी खान के प्रति निष्ठावान हो गए. वे बहुत सी लडाइयों में अलीवर्दी खान का निष्ठापूर्वक बहादुरी के साथ मदद किया.

मुग़ल बादशाह अहमद शाह रंगीला के तरफ से सुंदर सिंह को बंगाल के नवाब के साथ वफादारी किये जाने के कारण उन्हें महाराजा का सनद, तलवार, उपाधि एवं वस्त्र प्रदान की गई. बंगाल के नवाब से शाह के उपाधि प्राप्त करने के कारण अब वे सुंदर शाह कहलाने लगे. अब वे चारों तरफ महाराजा सुंदर शाह के नाम से जाने लगे.

उनलोगों से दोस्ताना सम्बन्ध राजा सुंदर शाह जीवन भर मरते दम तक निभाया. महाराजा सुंदर सिंह अथिति बन कर बराबर दिल्ली और मुर्शिदाबाद आते जाते रहते रहे. वे बंगाल के नवाब के तरफ से कई युद्ध मराठों, अफगान लूटेरे, और पठानों के खिलाफ बहादुरी पूर्वक लड़ते रहे और उन्हें युद्ध में विजयी दिलवाते रहे थे. सुंदर सिंह अलीवर्दी खान के मदद कभी नहीं भूले थे. वह दिल्ली के मुग़ल बादशाह के विरुद्ध कोई सैन्य अभियान नहीं चलाये. वह अपने जीवन पर्यन्त तक अपनी वफादारी दिखाते रहे थे.

सुंदर सिंह ने अलीवर्दी खान के साथ बिहार और बंगाल में सभी छोटी- बड़ी युद्ध दिल्ली के मुग़ल बादशाह के तरफ से ईमानदारी एवं बहादुरी से लड़ी और उसमें विजयी हुए. उन्होंने दिल्ली के मुग़ल बादशाह का शासन बंगाल प्रान्त में काफी मजबूत किया. अपना टिकारी राज के विस्तार करने और ताकतवर बनाने पर भी ध्यान दिया.

बंगाल के नए नवाब सरफ़राज़ खान पर अलीवर्दी खान की कोपदृष्टि थी. वह हमेशा उनका मजाक उड़ाते रहता था. इसी कारण अलीवर्दी खान ने राजा सुंदर सिंह के साथ एक बड़ी सेना को ले कर कमजोर सरफ़राज़ खान पर हमला बोल दिया. वे लोग पटना से आगे बढकर राजमहल के पास गिरिया में १० अप्रिल १७४० को सरफ़राज़ खान को युद्ध में हरा कर उसे मार डाला और बंगाल के नवाब के गद्दी हथिया ली. उन्होंने दिल्ली के मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला को रिश्वत दे कर बंगाल के नवाब की स्वीकृति पा ली. अलीवर्दी खान अत्यंत योग्य, सच्चरित्र और कर्तव्यपरायण व्यक्ति था.

बंगाल के नवाब बनने के बाद अलीवर्दी खान अपने भाई के दामाद जैनुद्दीन को बिहार का सूबेदार बना दिया. सरफ़राज़ खान के साथ युद्ध में सुंदर सिंह ने अपनी सेना के साथ अलीवर्दी खान को साथ दिया था. वे बंगाल के नवाब के रूप सारी लड़ाई भी अपनी ताकत से करीब १५ वर्ष तक लड़ते रहे,

अलीवर्दी खान को सहायता करने से राजा सुंदर सिंह का कद उसके काफी बढ़ चूका था. अलीवर्दी खान ने सुंदर सिंह के सहयोग पर प्रसन्न हो कर उन्हें काफी धन, घोडा, हाथी, सोना, चांदी, हीरा एवं जवाहरात भेंट में दिया. वे सुंदर सिंह को अपनी सेना का मुख्य सेना अधिकारी नियुक्त कर दिया था.

अलीवर्दी खान ने बिहार में नरहट, समाई, रामगढ और अन्य पहाड़ी इलाके के विद्रोहियों को कुचलना शुरू कर दिया. इस काम में मित्र हिदायत अली खान का सहयोग प्राप्त था. दक्षिण बिहार के पहाड़ियों में स्थित इलाके में राजा रामगढ एक मजबूत और शक्तिशाली जमींदार थे. बंगाल के नवाब और अजीमाबाद सूबेदार का इन पर नियंत्रण नहीं था. अलीवर्दी खान ने सुंदर सिंह और हिदायत खान के मदद से रामगढ़ किला पर कब्ज़ा कर लिया. उसे कब्ज़ा करने के बाद इसके आस पास कई छोटे छोटे गढ़, इलाके इनके कब्ज़े में आ गए.

मुग़ल साम्राज्य बिखरने के बाद भारत में छोटे-छोटे सामंतों के बीच सत्ता पर कब्ज़ा करने की होड़ मच गयी थी. भारत के दक्षिण में मराठे शक्तिशाली होते जा रहे थे. इसके फलस्वरूप चार विशाल राज्यों के रूप में मराठा संघ की स्थापना हो चुकी थी. ये संघ थे- नागपुर का भोसले राजवंश, ग्वालियर का सिंधिया राजवंश, इंदौर के होलकर राजवंश और बरौदा के गायेकवाढ़. सुंदर सिंह ने मराठा आक्रमणकारी से बिहार को तीन बार बचाया था.

नागपुर के भोसले राजवंश के बाजीराव प्रथम के मृत्यु के बाद उनके १९ वर्षीय पुत्र बालाजी बाजीराव (१७४०-१७६१) को पेशवा नियुक्त किया गया. छत्रपति की समस्त शक्ति उनके हाथ में आ गयी थी. अब सतारा के स्थान पर पूना मराठा के राजधानी हो गया था. बालाजी बाजीराव के नेतृत्व में लगभग ५०००० हज़ार सैनिकों के साथ उत्तर भारत होते हुए बंगाल की ओर बढ़ रहे थे.

सन १७४१ इसवी में मराठा अक्रमणकारियों ने बिहार पर हमला बोल दिया था. मराठा लड़ाका को बिहार में प्रवेश की सूचना पा कर बंगाल के नवाब अलीवर्दी खान, दिल्ली के मुग़ल बादशाह के सेनापति हिदायत अली खान और सुंदर सिंह ने मिल कर मराठा आक्रमण को रोकने के लिय तय किया की मराठा से युद्ध करना है और उसे पराजित कर यहाँ से भगाना हैं. अब उनलोगों के द्वारा मराठा आक्रमणकारी से युद्ध कर उसे वापस भेजने की तैयारी होने लगी.

मराठा लड़ाका बिहार के इलाका से होते हुए बंगाल पहुँच गया. दक्षिण भारत की सैन्य विरासत में ‘मारो और भागो’ की छापामार रणनीति एक अहम रही है. मराठों ने लाचार बंगालवासियों के खिलाफ इसी रणनीति को अपनाया था. इस समय बंगाल में नवाब अलीवर्दी खान का शासन था. तब मराठों की इस सैन्य रणनीति ने नवाब की सेना को बुरी तरह उलझा दिया था. हालांकि इससे पहले कुछ एक मौकों पर आमने-सामने की लड़ाई में उसने मराठों को हराया था लेकिन ज्यादातर समय वे नवाब की सुस्त घुड़सवार सेना को चकमा देकर आबादी वाले क्षेत्रों से लूटमार करने में लग जाते थे.

मराठा सैनिकों की लूट का यह सिलसिला दस साल तक चला. उनकी इस मुहिम ने सीमाक्षेत्र के बंगालवासियों को कंगाल कर दिया और यहां बड़े स्तर पर गरीबी फैल गई. इन सालों में मराठा लड़ाका लड़ाका ने चार लाख लोगों को मौत के घाट उतारा था और यहां बंगाल के इलाके में बड़े स्तर पर लोगो में गरीबी फैल गई.

इधर अब मुर्शिदाबाद में अलीवर्दी खान, हिदयात अली खान और सुंदर सिंह की संयुक्त सेना ने डट कर मराठा लड़ाका सैनिकों का मुकाबला किया. हार कर मराठा लड़ाका वापस लौटते समय बंगाल के कई इलाका को बुरी तरह रौदते हुए वापस नागपुर पहुँच गया.

इधर अजीमाबाद में एक और मुशीबत आ खड़ा हुआ अफ़ग़ान सरदार मुस्तफा खान के नेतृत्व में अफगानों की बड़ी सेना ने चढ़ाई कर दी. उस समय पटना में अलीवर्दी खान के दामाद जैनुद्दीन अजीमाबाद के सूबेदार थे वे घबरा कर सुंदर सिंह तथा अन्य कुछ ज़मींदारों से सहायता माँगा. राजा सुंदर सिंह ने अपनी सेना तथा अन्य ज़मींदारों के सैन्य बल के साथ पटना पहुँच गए. सभी ने एक साथ मिल कर मुस्तफा खान के सेना पर चढ़ाई कर दी. इस युद्ध में मुस्तफा खान की हार हुई और उसका एक करीबी रिश्तेदार हैबत जंग मारा गया. युद्ध हार कर मुस्तफा खान अजीमाबाद से भाग खड़ा हुआ.

सन १७४३ इसवी में मराठा बालाजी राव पेशवा पचास हज़ार सवार के साथ बंगाल पर आक्रमण करने के लिय गया जिला से गुजरा और गया में जहाँ-जहाँ वह गुज़रा ज़मींदारों ने सर झुका लिया. सिवाय एक अहमद खान के जो दाउद खान के पोते थे और गोह में उनकी ज़मींदारी थी. उसने गौसगढ़ में नाममात्र उनका मुकाबला किया, बाद में उन्होंने पचास हज़ार रूपया जुरमाना मराठा को दे कर अपनी जान बचा ली. पहले मराठा लड़ाका मुंगेर होता हुआ भागलपुर पहुँचा, वहां से बंगाल के मुर्शिदाबाद इलाका में प्रवेश कर गया.

दो तीन साल के बाद मराठा लड़ाका बंगाल से युद्ध करने के बाद, वह वापसी के समय सन १७४५ के फ़रवरी माह में गया होती टिकारी पंहुची. वहां उसने अपने दुश्मन अलीवर्दी खान के मित्र राजा सुंदर सिंह के टिकारी किला के बाहरी इलाका को विनाश करते हुए सोन नदी को पार करते हुए इस जिले से बहार निकल गयी.

२० जून १७४५ में अफगान सरदार ने दुबारा पटना पर चढ़ाई कर दी. अलीवर्दी खान और राजा सुंदर सिंह की संयुक्त सेना पटना पहुँच गयी, इनलोगों की मुस्तफा खान की अफगान सेना से बक्सर के पास जगदीशपुर के मैदान में जबरदस्त लड़ाई हुई. इस युद्ध में अफगान सरदार मुस्तफा खान की हार हुई और वह मारा गया.

सन १७५१ इसवी में मराठा बालाजी बाजीराव पेशवा के नेतृत्व में मराठा लड़ाका पटना पहुंचा. अलीवर्दी खान और सुंदर सिंह के संयुक्त सेना के फतुहा में उनलोगों के साथ जबरदस्त युद्ध किया जिसमें मराठा सरदार बालाजी बाजीराव पेशवा युद्ध हार गए.

इस जीत के बाद महाराजा सुंदर शाह की बहादुरी और वफादारी जगजाहिर हो गया. उनकी बहादुरी और कार्य को देख कर दिल्ली की मुग़ल बादशाह के द्वारा उन्हें बहुत सम्मान मिलने लगा.उनकी यात्रा के लिय एक विशेष झालरदार पालकी की व्यवस्था की गयी. ऊंट के पीठ पर नागडा बजाता हुआ आदमी साथ में टिकारी राज के निशान बने हुए ध्वज को ले कर चलते थे. उस समय इस तरह के पदक एवं सम्मान बड़े बड़े रजवाड़े को ही मिलता था.

राजा सुंदर शाह अपने पराक्रम से अनेक युद्ध में एक बहुत बड़ा मददगार हो कर उभरे. उन्हें दिल्ली के मुग़ल बादशाहों एवं बंगाल के नवाबों के द्वारा बराबर प्यार और सम्मान मिलता रहा था. उस समय वे अपनी शक्ति और बुधि से टिकारी राज का भी काफी शक्तिशाली और विस्तार किया.

९ अप्रैल १७५६ इसवी में अलीवर्दी खान की ८० वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गयी. उनकी पुत्री के लड़का सिराजदौला बंगाल के नवाब बना. वह पलासी के युद्ध में हार गए थे और मारे गए थे. २३ जून १७५७ इसवी को मीर जाफर बंगाल के नवाब बने. मीर जाफ़र के बड़ा लड़का मीरन अजीमाबाद के सूबेदार बनाये गए. इन सब घटित घटनाओ से सुंदर सिंह का मन बहुत व्यथित हुआ. वे अपने मित्र अलीवर्दी खान के परिवार वालों की दुर्दशा से दुखी हो कर उनके दुश्मनों के खिलाफ बदला लेने के मन बना लिय.

सुंदर सिंह को एक बड़ा फौज लेकर अंग्रेजों, बंगाल के नवाब एवं अजीमाबाद के सूबेदार से युद्ध कर उनकी पराजित करने का योजना था. इसी सम्बन्ध में सुंदर सिंह इलाहबाद के नाजिम कुली खान, अवध के नवाब सुज़ाउदौला तथा बादशाह अली गौहर से संपर्क करना शुरू कर दिया. वे सभी लोग सुंदर सिंह को सहायता करने के लिय तैयार हो गए. सभी लोग की सेना कर्मनाशा नदी के पास आ गयी थी. सुंदर सिंह उनकी सेना को आगवानी के लिय कर्मनाशा नदी पास चले गए थे. इसी समय अंग्रेज के द्वारा सुंदर सिंह को सूचना मिली की उनकी सेना मुंगेर के किला में लौट चुकी है, वह शांति चाहता है, उन्होंने संभावित युद्ध को टाल दिया गया.

अँगरेज़ सुंदर सिंह के मुर्शिदाबाद में नहीं रहने पर सिरौजदाउला से बंगाल के नवाब के गद्दी हड़पने के योजना बनाया था. अँगरेज़ उनकी वीरता से बहुत डरता था, वह जानता था की सुंदर सिंह के पलासी में मौजूदगी, उनकी भारत में रहने की किस्मत को पलट देगा.

नरहट के जागीरदार कामगार खान को राजा सुंदर सिंह से जबरदस्त दुश्मनी थी, उन्होंने उसे कई बार हराया एवं प्रताड़ित किया था, उससे उसका किला और धन इत्यादि सब छिन लिया था. वह महराजा के खिलाफ बराबर साजिश रचते रहता था. वह महाराजा के एक विश्वासी सैनिक गुलाम गौस को अपना बदला लेने के लिय इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. गुलाम गौस राजा के एक विश्वासी अंगरक्षक था, वह बहुत पहले से ही उनकी हत्या करने की योजना बना रहा था. अब खतरनाक योजना में कामगार खान का सान्निध्य उसे प्राप्त हो गया था. उनलोगों के द्वारा एक खतरनाक षड्यंत्र तैयार की जा रही थी.

महाराजा सुंदर सिंह सन १७५७ को बसंत पंचमी के तीन बजे सुबह, रोज के दिनचर्या के तरह कसरत कर रहे थे. उसी समय गुलाम गौस अपने तलवार से राजा सुंदर सिंह के सर पर प्रहार कर उनका सर काट लिया. महाराजा सुंदर सिंह की हत्या हो गयी. गुलाम गौस राजा के सर को ले कर भागा जा रहा था की राजा के एक रिश्तेदार सूरत सिंह ने उसे पीछा करते हुए उसके साथ लड़ाई किया, अंत में अपने तलवार से गुलाम गौस के सर को काट कर उसकी हत्या कर दी. टिकारी के ये ४६ वर्षीय चमकता तारा का अंत हो गया.

महाराजा सुंदर सिंह के समय मगध में टिकारी राज काफी प्रसिद्ध था. टिकारी राज की सीमा बहुत दूर तक फ़ैल गयी थी. टिकारी किला का निर्माण अभेद रूप में हो चूका था. टिकारी किला के आसपास टिकारी शहर बस चुका था. टिकारी किला का मजबूत किलाबंदी किया जा चूका था.

महाराजा सुंदर सिंह के पास एक काली नाम का तलवार था. वे उस काली तलवार से काफी युद्ध लड़ कर जीते थे. उनका काली तलवार वर्षों तक टिकारी किला में शोभा बढाती रही थी. टिकारी राज में प्रत्येक वर्ष दुर्गा पूजा के समय काली तलवार की भी वर्षों तक पूजा की जाती थी. सुंदर सिंह के एकमात्र पुत्र दुलह सिंह थे. युवा अवस्था में किसी युध में उनकी मृत्यु हो गयी थी. सुंदर सिंह ने अपने भतीजा बुनियाद सिंह को गोद ले लिए थे.

अपने बड़े भाई राजा त्रिभुवन सिंह की मृत्यु के बाद से सन १७५७ तक का उनका शासन का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा रहा था. उनका २२ वर्ष के कार्यकाल टिकारी राज के लिय मील का पत्थर साबित हुआ. उन्होंने मगध के बारह परगना पर कब्ज़ा कर लिय थे.

सुंदर सिंह के पराक्रम का अन्दाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है की बिहार के दक्षिण में सुदूर कई दुर्गम पहाडी गढ़ पर भी उनका कब्ज़ा रहा था. इधर कर्मनाशा से बंगाल के सीमा तक राज था. उधर चौसा, बक्सर तक राज फैला था.

वह टिकारी राज के सबसे महानतम शासक थे. वह अपने आपको स्वतंत्र शासक मानते थे. वह अपने सम्मान के लिय छत्र, ढोल और अनेक तरह के वाद यंत्र इस्तेमाल करते थे. आज भी लोग टिकारी राज के बाद सबसे पहले सुंदर सिंह के नाम याद करते है.

यह टिकारी राज का स्वर्णिम काल था, इस काल में टिकारी राज का क्षेत्रफल काफी विशाल हो गया था, राज का खज़ाना धन सम्पदा से लबालब भरा हुआ था, सेना काफी विशाल और ताकतवर हो गयी थी. इस काल में टिकारी राज दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की कर रहा था, इसलिय इस काल को टिकारी राज का स्वर्णिम काल कहा जाता है. यह स्वर्णिम काल दुबारा लौट कर कभी नहीं आया. सुंदर शाह को प्रायः राणा पंडित ब्राम्हणपति टिकारी कहा जाता था.

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