Friday, October 23, 2026

Tikari RAJ 9 ANNAS - MAHARANI RAJROOP KUNWAR

 

Tikari Raj Emblem


टिकारी राज की महारानी राजरूप कुँवर:
शिक्षा, चिकित्सा और जनसेवा की वह विरासत, जिसे इतिहास में याद रखा जाना चाहिए!
🙏 टिकारी राज नौ आना की महारानी राजरूप कुँवर को सादर नमन! 🙏
क्या आप जानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और आधुनिक शिक्षा तथा चिकित्सा सुविधाएँ आम लोगों तक सीमित रूप में पहुँचती थीं, तब टिकारी राज की एक महारानी ने विद्यालयों, अस्पतालों, छात्रवृत्तियों, सड़कों, धार्मिक स्थलों और निर्धन लोगों की सहायता के लिए अपना राजकोष खोल रखा था?
वह थीं — महारानी राजरूप कुँवर, जिनका नाम टिकारी राज की जनकल्याणकारी परंपरा के साथ जुड़ा हुआ है।
उनकी कहानी केवल एक राजपरिवार की महारानी की कहानी नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक दौर में शिक्षा, सामाजिक दायित्व और लोकसेवा के लिए किए गए प्रयासों की कहानी भी है।
👑 1. महारानी राजरूप कुँवर का परिचय
प्रस्तुत ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, महारानी राजरूप कुँवर का जन्म 1828 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के प्रतापबंद में हुआ था।
उनका विवाह 1863 ई. में टिकारी राज नौ आना के महाराजा राम किशुन सिंह से हुआ। महाराजा राम किशुन सिंह, महारानी इन्द्रजीत कुँवर के दत्तक पुत्र थे। इस प्रकार राजरूप कुँवर टिकारी राज की वरिष्ठ महारानी इन्द्रजीत कुँवर की पुत्रवधू बनीं।
महारानी राजरूप कुँवर ने अपनी सास महारानी इन्द्रजीत कुँवर के साथ रहकर राजकाज और संपदा के प्रबंधन का अनुभव प्राप्त किया।
उनकी एकमात्र संतान पुत्री राधेश्वरी कुँवर थीं, जिन्हें लोग किशोरी मैइयाँ के नाम से भी जानते थे। राधेश्वरी कुँवर आगे चलकर टिकारी राज के अंतिम महाराजा गोपाल शरण सिंह की माता बनीं।
📚 2. टिकारी राज उच्च विद्यालय: शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान
महारानी राजरूप कुँवर के जनकल्याणकारी कार्यों में शिक्षा का विशेष स्थान बताया जाता है।
उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, उन्होंने 1876 ई. में टिकारी राज उच्च विद्यालय की स्थापना कराई। यह संस्थान टिकारी और आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।
विद्यालय का ‘T’ आकार का भवन अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है।
महारानी ने केवल विद्यालय बनवाने तक ही अपने दायित्व को सीमित नहीं रखा, बल्कि उसके संचालन और विकास के लिए भी आर्थिक व्यवस्था की।
उनके शिक्षा संबंधी योगदान में शामिल बताए गए प्रमुख कार्य थे:
🔹 विद्यालय के विकास के लिए 30,000 रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज खरीदना।
🔹 शिक्षकों और कर्मचारियों के निवास के लिए 3,000 रुपये में अलग भवन बनवाना।
🔹 प्राथमिक शिक्षा के लिए विद्यालय के निकट 5,000 रुपये की लागत से एक प्राथमिक विद्यालय बनवाना।
🔹 अपने राज के विभिन्न स्थानों पर चलने वाले विद्यालयों के संचालन के लिए 1,000 रुपये वार्षिक खर्च करना।
🔹 पुस्तकों, कॉपियों, रजिस्टरों और अन्य शैक्षिक सामग्री के लिए 1,300 रुपये वार्षिक उपलब्ध कराना।
🔹 विद्यार्थियों की छात्रवृत्तियों और पदकों के लिए 200 रुपये प्रतिवर्ष खर्च करना।
🔹 गया, जहानाबाद, शेरघाटी, जमोधा और अन्य स्थानों के शैक्षिक संस्थानों को आर्थिक सहायता देना।
🔹 टिकारी के कोंच में विद्यालय बनवाना तथा राज के विभिन्न मौजों में प्राथमिक पाठशालाओं के निर्माण पर धन खर्च करना।
📖 3. विद्यालय को दिया गया दुर्लभ ग्रंथ ‘गुलिस्ताँ’
महारानी राजरूप कुँवर के संबंध में एक और उल्लेखनीय विवरण मिलता है।
बताया जाता है कि उन्होंने टिकारी राज उच्च विद्यालय को फारसी साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘गुलिस्ताँ’ की एक दुर्लभ प्रति भेंट की थी। यह ग्रंथ फारसी के महान साहित्यकार शेख सादी की प्रसिद्ध रचना है।
विवरण में इस प्रति को मुगल बादशाह औरंगजेब के हस्तलेखन से संबंधित बताया गया है तथा इसकी स्याही में नीलम, माणिक, पन्ना, हीरा और अन्य दुर्लभ रत्नों के प्रयोग का उल्लेख है।
यदि इस ग्रंथ की मूल प्रति, उसके हस्तलेखन और उसकी उत्पत्ति से संबंधित प्रमाण उपलब्ध हों, तो यह टिकारी राज की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विरासत का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्याय हो सकता है।
ऐसे दुर्लभ ग्रंथ केवल पुस्तकालय की शोभा नहीं होते; वे अपने समय की साहित्यिक रुचि, ज्ञान-संरक्षण और सांस्कृतिक संपर्कों के साक्षी भी बन सकते हैं।
🏥 4. चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान: द एम्प्रेस डिस्पेंसरी
महारानी राजरूप कुँवर के जनकल्याणकारी कार्यों में चिकित्सा व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है।
प्रस्तुत विवरण के अनुसार, उन्होंने टिकारी में लगभग 30,000 रुपये की लागत से The Empress Dispensary, Tekari की स्थापना कराई।
यह संस्था उस समय के टिकारी में चिकित्सा सुविधाओं के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल रही होगी।
इसके अतिरिक्त, डॉक्टरों और कर्मचारियों के रहने के लिए अलग आवास बनवाने पर 6,400 रुपये खर्च किए जाने का भी उल्लेख है।
महारानी ने जहानाबाद के अस्पताल के लिए वार्षिक आर्थिक सहायता देने तथा अन्य सार्वजनिक संस्थानों को सहयोग पहुँचाने के प्रयास भी किए।
इन कार्यों का ऐतिहासिक महत्त्व इस बात में है कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए केवल भवन बनाना पर्याप्त नहीं होता; चिकित्साकर्मियों, संसाधनों और नियमित आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी आवश्यक होती है।
🛣️ 5. सड़क, नगरपालिका और सार्वजनिक सुविधाएँ
महारानी राजरूप कुँवर से संबंधित विवरणों में सड़क निर्माण और मरम्मत के लिए भी बड़ी राशि खर्च किए जाने का उल्लेख है।
बताया जाता है कि उन्होंने टिकारी से फतेहपुर के बीच सड़क की मरम्मत के लिए 16,000 रुपये दिए थे।
टिकारी नगरपालिका के निर्माण के लिए आवश्यक भूमि दान करने तथा उसके निर्माण हेतु आर्थिक व्यवस्था करने में भी उनकी भूमिका बताई जाती है।
यदि इन योगदानों की पुष्टि नगरपालिका के पुराने अभिलेखों, राजस्व दस्तावेजों और समकालीन रिपोर्टों से होती है, तो इससे टिकारी के नगरीय विकास के इतिहास में उनकी भूमिका और स्पष्ट होगी।
किसी नगर का विकास केवल महलों और किलों से नहीं होता। सड़कें, विद्यालय, अस्पताल, सार्वजनिक भवन और नागरिक सुविधाएँ ही उसके सामाजिक जीवन को आकार देती हैं।
🤝 6. निर्धन, निराश्रित और जरूरतमंद लोगों की सहायता
महारानी राजरूप कुँवर के बारे में एक अत्यंत उल्लेखनीय विवरण यह भी है कि वह प्रतिदिन भिखारियों, अत्यंत गरीब लोगों, निराश्रित व्यक्तियों और बाहर से आने वाले लोगों की सहायता करती थीं।
प्रस्तुत विवरण में ऐसे लगभग 200 लोगों को प्रतिदिन भोजन, वस्त्र या नकद सहायता उपलब्ध कराने का उल्लेख मिलता है।
यदि इस विवरण की पुष्टि समकालीन दस्तावेजों से हो जाए, तो यह उनके दान और परोपकार की परंपरा को समझने का एक महत्त्वपूर्ण आधार बनेगा।
दान का वास्तविक सामाजिक महत्त्व तभी समझा जा सकता है, जब उसके पीछे जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुँचाने की नियमित व्यवस्था भी मौजूद हो।
🌾 7. अकाल राहत और सार्वजनिक सहायता
उन्नीसवीं शताब्दी में अकाल और खाद्य संकट भारतीय समाज के लिए गंभीर चुनौती थे।
महारानी राजरूप कुँवर से संबंधित विवरण में मद्रास के अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए 1,050 रुपये दान देने तथा 1887 ई. में मसौढ़ी क्षेत्र में अकाल राहत और सार्वजनिक कार्यों के लिए 13,000 रुपये की सहायता देने का उल्लेख है।
महारानी की ओर से धार्मिक स्थलों, तालाबों, घाटों और सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण अथवा मरम्मत में सहयोग दिए जाने की बात भी कही गई है।
🛕 8. धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत
महारानी राजरूप कुँवर के कार्यों का संबंध केवल शिक्षा और चिकित्सा से नहीं, बल्कि धार्मिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जोड़ा जाता है।
प्रस्तुत विवरण के अनुसार:
🔸 अयोध्या में ‘रसिक निवास’ नामक धर्मशाला का निर्माण कराया गया।
🔸 वृन्दावन में ठाकुरवाड़ी बनवाने के लिए राजकोष से धन खर्च किया गया।
🔸 गया में धार्मिक एवं शैक्षिक संस्थाओं को आर्थिक सहायता दी गई।
🔸 कलकत्ता के Zoological Gardens के विकास में महारानी इन्द्रजीत कुँवर के साथ सहयोग देने का उल्लेख मिलता है।
🔸 गया में पुस्तकालयों, शैक्षिक संस्थाओं और सामाजिक गतिविधियों के लिए दान दिए जाने की बात भी सामने आती है।
इन कार्यों का समग्र अध्ययन यह समझने में सहायता कर सकता है कि उस समय के राजपरिवार धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों के संरक्षण में किस प्रकार भाग लेते थे।
🖨️ 9. टिकारी राज प्रेस और प्रशासनिक प्रशिक्षण
महारानी राजरूप कुँवर के नाम से जुड़े विवरणों में गया के पहसी क्षेत्र में TIKARI RAJ PRESS की स्थापना का उल्लेख मिलता है।
इसके अतिरिक्त, टिकारी राज उच्च विद्यालय में पटवारियों और सर्वेक्षकों के प्रशिक्षण के लिए अलग कक्षा की व्यवस्था किए जाने की बात भी कही गई है।
👑 10. महारानी के बाद टिकारी राज नौ आना का उत्तराधिकार
महारानी राजरूप कुँवर की एकमात्र पुत्री राधेश्वरी कुँवर थीं, जिन्हें किशोरी मैइयाँ के नाम से जाना जाता था।
प्रस्तुत पारिवारिक विवरण के अनुसार, महारानी ने अपनी संपत्ति अपनी पुत्री को सौंप दी थी। उनके निधन के बाद राधेश्वरी कुँवर टिकारी राज नौ आना की महारानी बनीं।
राधेश्वरी कुँवर और बाबू अम्बिका शरण सिंह के पुत्र गोपाल शरण सिंह आगे चलकर टिकारी राज के अंतिम महाराजा बने।
महारानी राजरूप कुँवर की मृत्यु 1 अक्टूबर 1884 को मध्य प्रदेश के पंडोला में होने का उल्लेख मिलता है।
उनके निधन के समय गोपाल शरण सिंह की आयु और उसके बाद Court of Wards की स्थापना से संबंधित घटनाओं का विस्तृत विवरण अलग से अभिलेखों के आधार पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
गया के तत्कालीन कलेक्टर जॉर्ज अब्राहम गियर्सन और टिकारी राज नौ आना को Court of Wards के अधीन किए जाने की घटना, राज की प्रशासनिक व्यवस्था तथा उत्तराधिकार के इतिहास का एक अलग और महत्त्वपूर्ण अध्याय है।
🌺 निष्कर्ष: महारानी राजरूप कुँवर की विरासत
महारानी राजरूप कुँवर की ऐतिहासिक भूमिका का मूल्यांकन केवल उनके राजपरिवार, संपत्ति या पद के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
उनसे संबंधित विवरणों में विद्यालयों की स्थापना, छात्रवृत्तियाँ, चिकित्सा संस्थान, सड़कें, सार्वजनिक भवन, अकाल राहत, धार्मिक संस्थाएँ और जरूरतमंद लोगों की सहायता जैसे अनेक कार्य सामने आते हैं।
टिकारी का इतिहास केवल राजमहलों और राजाओं का इतिहास नहीं है। यह उन संस्थाओं, प्रयासों और व्यक्तियों का इतिहास भी है, जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन को आकार देने में योगदान दिया।
महारानी राजरूप कुँवर की विरासत का गंभीर शोध और संरक्षण टिकारी के इतिहास को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें। 🙏
🙏 टिकारी राज की इस ऐतिहासिक विरासत को जानिए, अभिलेखों से जोड़िए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाइए। 🙏
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रजनीश वाजपेयी
टिकारी, गया





Some of the works done by Maharani RajRoop Kunwar - 

Tikari Raj Inter School - the oldest surviving school of Bihar









Tikari Municipality



Maharani Rajroop Kuer, born in 1828 in Pratapvand in Muzzaffarpur, she was groomed in zamindari administration by her mother-in-law Maharani Indrajit Kuer; she established the Tikari Raj High School and supported numerous social and educational programs and scholarships in the district and beyond; she was married with Maharaja Ram Narayan Krishna Singh in 1863; under the kind care of her mother-in-law Maharani Indrajit Kuer, she received a complete training in the management of the Zamindari affairs. The Tekari Raj with all its establishment and property, moveable and immoveable was bequeathed by her husband by a will dated 21st August 1875, and which she managed with much credit to herself. She has disguised herself by public spirit.
she had issue a daughter namely RADHESHWAR KUER alias Kishori Mayan. She became widow in 1875 & died in 01.10.1884 at Pandola in Madhya Pradesh.


Shri Devki Nandan Khatri, famous writer of Chandrakanta was a Dewan in her Estate since 1905 to 1910.





Wednesday, October 21, 2026

Sheohar RAJ - The Legacy, The Heritage










In Late 2025, 100th Birth Anniversary was celebrated of Late Kameshwari Nandan Singh at his compound in Sheohar. 




The Temple in the name of Lord Hanuman,  constructed by the Late Rani of Sheohar - Kishori Kuer Jee.  She was the daughter of Rani Bhuvneshwari Kuer of Tikari 7 Annas. (Later the Maharani of Amawan-Tikari Raj). Rani Bhuvneshwari Kuer was the 2nd richest woman in India after the Begum of Bhopal. Rani Kishori Kuer built temple just like her mother's great grand mother , Rani Rameshwar Kuer (Dulhin Saheba), Regent of Tikari (Seven Annas) - some 150 years ago.



Rani Bhuvneshwari Kuer of Tikari 7 Anna.




The Temple of Late Rajkumar Bindeshwari Nandan Singh at Sheohar.




Saturday, November 1, 2025

Rameshwar Bagh Fort - Tekari Raj 7 Annas (1880's)

 Rani Rameshwar Kuer (Dulhin Saheba), Regent of Tikari (Seven Annas), she ruled as regent of Tikari Raj Seven Annas and served as guardian during the minority of her then infant great grand daughter, Rani Bhuvneshwari Kuer; cleared large debts on the Raj and ran an efficient purdah administration, married Raja Ran Bahadur Singh, and had issue.

The Rameshwar Bagh Fort along with the Rameshwar Bagicha and various temples were all built by her. She was the ruler of Tikari Raj 7 Annas.

Following are some of the images of the Rameshwar Bagh Fort, Pond and Temples.

Rameshwar Bagh Fort -










Rameshwar Bagh Pond -


Rameshwar Bagh Temple , made of Marble (almost 150 years ago)-




Thakur Jee temple -



Bhole Nath Temple @Rameshwar Bagh


Surya Dev Temple @ Rameshwar Bagh